स्कूल शिक्षा विभाग की निगरानी पर बड़ा सवाल! बच्चों से मारपीट, मानसिक प्रताड़ना और शिक्षकों के कठोर व्यवहार पर कब जागेगा प्रशासन?

स्कूल शिक्षा विभाग की निगरानी पर बड़ा सवाल! बच्चों से मारपीट, मानसिक प्रताड़ना और शिक्षकों के कठोर व्यवहार पर कब जागेगा प्रशासन?

अनुभवहीन शिक्षकों की नियुक्ति, अभिभावकों की शिकायतों की अनदेखी, बच्चों को दंड देने और निजी स्कूलों की कथित मनमानी पर कलेक्टर व शिक्षा विभाग की सख्त निगरानी जरूरी।

बच्चों के भविष्य की नींव स्कूल में रखी जाती है, लेकिन यदि इसी जगह बच्चों को डर, अपमान, मानसिक दबाव और शारीरिक दंड का सामना करना पड़े, तो यह गंभीर चिंता का विषय है। देश के अलग-अलग हिस्सों से स्कूलों में बच्चों के साथ मारपीट, कठोर व्यवहार और अनुचित सजा की घटनाएं सामने आती रही हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि स्कूल शिक्षा विभाग बच्चों की सुरक्षा और शिक्षकों के व्यवहार की निगरानी कितनी गंभीरता से कर रहा है?

बिना पर्याप्त अनुभव और प्रशिक्षण के शिक्षण, बच्चों के भविष्य से समझौता तो नहीं?

शिक्षक का काम केवल कक्षा में खड़े होकर बच्चों को पढ़ाना नहीं, बल्कि उनकी उम्र, मानसिक स्थिति और सीखने की क्षमता को समझना भी है। यदि कहीं व्यक्तिगत संबंधों या सिफारिश के आधार पर नियुक्तियां की जा रही हैं, आवश्यक योग्यता और प्रशिक्षण की अनदेखी हो रही है या अनुभवी शिक्षकों को अनुचित तरीके से हटाया जा रहा है, तो ऐसे मामलों की जांच होनी चाहिए। शिक्षक नियुक्त करने में पारदर्शिता और बच्चों के प्रति संवेदनशील व्यवहार को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।

शिकायत करने पर बच्चे के साथ अलग व्यवहार की आशंका

कई अभिभावक बच्चों के साथ शिक्षक के कठोर व्यवहार या कथित मारपीट की शिकायत करने से इसलिए डरते हैं कि कहीं इसका असर उनके बच्चे पर न पड़े। यदि शिकायत के बाद अभिभावक के फोन या संदेशों को नजरअंदाज किया जाता है, उन्हें ब्लॉक किया जाता है या बच्चे के साथ कक्षा में अलग व्यवहार करने, अपमानित करने अथवा परीक्षा में जानबूझकर कम अंक देने जैसी शिकायतें सामने आती हैं, तो उनकी निष्पक्ष जांच जरूरी है।

किसी भी बच्चे को अभिभावक की शिकायत के कारण निशाना नहीं बनाया जाना चाहिए। प्रशासन को ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिए, जहां माता-पिता बिना डर अपनी बात रख सकें और उनकी शिकायत पर समयबद्ध कार्रवाई हो।

अनुशासन के नाम पर दंड और अपमान कितना उचित?

स्कूल में अनुशासन जरूरी है, लेकिन अनुशासन के नाम पर बच्चों को मारना, डराना, अपमानित करना या उठक-बैठक जैसी सजा देना स्वीकार्य नहीं होना चाहिए। प्रार्थना सभा में तेज धूप के बीच लंबे समय तक खड़ा रखना, छोटी-सी गलती पर कठोर दंड देना और बच्चों के साथ रूखे या अपमानजनक लहजे में बात करना भी गंभीरता से जांचे जाने वाले विषय हैं।

बच्चे स्कूल में अपनी बात रखने से डरने लगें, शिक्षक को देखकर घबराएं या शिकायत करने पर और अधिक परेशानी झेलने की आशंका महसूस करें, तो यह स्कूल के माहौल पर सवाल खड़े करता है। बच्चों को भय के सहारे नहीं, बल्कि समझ, संवेदनशीलता और उचित मार्गदर्शन से अनुशासित किया जाना चाहिए।

निजी स्कूलों की मनमानी पर कौन लगाएगा लगाम?

निजी स्कूलों में अतिरिक्त फीस, प्रतियोगी परीक्षाओं के नाम पर अनिवार्य भुगतान और अन्य शुल्कों को लेकर यदि अभिभावकों की शिकायतें हैं, तो शिक्षा विभाग को संबंधित नियमों के आधार पर उनकी जांच करनी चाहिए। किसी भी शुल्क की अनिवार्यता और उसके आधार की स्पष्ट जानकारी अभिभावकों को मिलनी चाहिए। नियमों का उल्लंघन पाए जाने पर जिम्मेदार स्कूल प्रबंधन के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए।

कलेक्टर और शिक्षा विभाग करें नियमित निरीक्षण

अब जरूरत केवल कागजी निरीक्षण की नहीं, बल्कि स्कूलों की वास्तविक स्थिति जानने की है। जिला कलेक्टर और शिक्षा विभाग के अधिकारी समय-समय पर स्कूलों का निरीक्षण करें, शिक्षकों के व्यवहार की समीक्षा करें और अभिभावकों से सीधे संवाद करें। ऐसी बैठकें आयोजित की जाएं, जिनमें माता-पिता बिना दबाव अपनी समस्याएं बता सकें। बच्चों की शिकायतों को गोपनीय तरीके से सुनने और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने की व्यवस्था भी होनी चाहिए।

जहां गंभीर शिकायतें प्रमाणित हों, वहां नियमानुसार जिम्मेदारी तय की जाए। आवश्यक मामलों में सक्षम प्राधिकारी द्वारा स्कूल की मान्यता रद्द करने तक की कार्रवाई पर विचार किया जाना चाहिए।

बच्चों की सुरक्षा से कोई समझौता नहीं होना चाहिए। स्कूल शिक्षा विभाग और जिला प्रशासन को यह सुनिश्चित करना होगा कि शिक्षक की नियुक्ति से लेकर उसके व्यवहार तक जवाबदेही तय हो। अभिभावकों की आवाज दबने न पाए और किसी बच्चे को शिकायत करने की कीमत न चुकानी पड़े। आखिर बच्चों के भविष्य की जिम्मेदारी सिर्फ माता-पिता की नहीं, बल्कि स्कूल प्रबंधन और पूरे शिक्षा तंत्र की भी है।

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