पांचवी अनुसूची क्षेत्रों में बढ़ते औद्योगिकीकरण पर मंथन, प्रभावित ग्रामीणों ने सुनाई आपबीती
रायगढ़।जिले के रायगढ़ अंतर्गत तमनार, धरमजयगढ़, घरघोड़ा, छाल और खरसिया जैसे पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों में तेज़ी से बढ़ रहे औद्योगिकीकरण के बीच स्थानीय समुदायों और परियोजना प्रबंधन के बीच टकराव की स्थिति गहराती जा रही है। इन्हीं हालातों को लेकर एक महत्वपूर्ण परिचर्चा आयोजित की गई, जिसमें प्रभावित ग्रामीणों ने खुलकर अपनी बात रखी।
कार्यक्रम का उद्देश्य स्पष्ट था — शासन-प्रशासन, उद्योग प्रबंधन और स्थानीय समुदायों के बीच संवाद की एक ठोस शुरुआत। लेकिन विडंबना यह रही कि जिन पर जवाबदेही तय होनी थी, वे ही इस संवाद में उपस्थित नहीं हुए। उद्योग और प्रशासन के प्रतिनिधियों की गैरमौजूदगी ने कई सवाल खड़े कर दिए।परिचर्चा में वक्ताओं ने आरोप लगाया कि वनों की अंधाधुंध कटाई, औद्योगिक अपशिष्टों का नियमविरुद्ध निपटान, दूषित जल का सार्वजनिक जलस्रोतों में बहाव, वनाधिकार दावों की अनदेखी और ग्राम सभाओं की सहमति की उपेक्षा जैसे गंभीर मुद्दे लगातार सामने आ रहे हैं। आदिवासी भूमियों के गैर-आदिवासियों को कथित अवैध हस्तांतरण पर भी चिंता व्यक्त की गई।औद्योगिक परिसरों में सुरक्षा मानकों की अनदेखी से श्रमिकों की मौत के मामलों को भी गंभीर विषय बताया गया। कई ग्रामीणों ने कहा कि अधिकारों की बात करने पर उन्हें झूठे पुलिस मामलों और प्रताड़ना का सामना करना पड़ा। कुछ को न्यायालय की शरण लेनी पड़ी, तब जाकर प्रशासन ने संज्ञान लिया।छाल, धरमजयगढ़, तमनार और घरघोड़ा से आए ग्रामीणों ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि जागरूकता की कमी, प्रशासनिक उदासीनता और शिकायतों के समयबद्ध निराकरण का अभाव संघर्ष को और गहरा बना रहा है।





सामाजिक चिंतकों ने सुझाव दिया कि उद्योग-प्रशासन-समुदाय के बीच नियमित संवाद तंत्र स्थापित हो, ग्राम सभाओं को सशक्त बनाया जाए और पर्यावरणीय नियमों के कड़ाई से पालन की निगरानी सुनिश्चित की जाए।परिचर्चा का आयोजन सेंटर फॉर द सस्टेनेबल यूज़ ऑफ़ नेचुरल एंड सोशल रिसोर्सेज (सीएसएनआर), मुनादी डॉट कॉम तथा आदिवासी दलित मजदूर किसान संघर्ष, रायगढ़ (छत्तीसगढ़) के संयुक्त तत्वावधान में किया गया।
कार्यक्रम का निष्कर्ष स्पष्ट था — विकास और अधिकारों के बीच संतुलन ही स्थायी समाधान की कुंजी है।















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