ममता का क्षरण या समाज की चूक? एक झकझोर देने वाली चेतावनी
**पूजा जायसवाल**त्वरित टिप्पणी*
छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले की कापू तहसील की धरती से सामने आई यह घटना सचमुच समाज को झकझोर देने वाली घटना है।एक ऐसी त्रासदी, जिसने न केवल एक मासूम की जिंदगी छीन ली, बल्कि हमारे सामाजिक और नैतिक ढांचे पर भी गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं। यह कहा जा रहा है कि यह छत्तीसगढ़ की पहली ऐसी घटना है और अगर ऐसा है, तो यह और भी चिंताजनक संकेत है कि हम एक ऐसे मोड़ पर खड़े हैं, जहां मानवीय संवेदनाएं धीरे-धीरे क्षीण होती जा रही हैं।
मां, यह शब्द अपने आप में सुरक्षा, स्नेह और त्याग का पर्याय है। लेकिन जब वही मां अपने ही बच्चे की जान ले ले, तो यह केवल एक अपराध नहीं रह जाता, यह एक सामाजिक विफलता का प्रतीक बन जाता है। यह घटना हमें भीतर तक झकझोरती है, क्योंकि यह हमारी उस सामूहिक धारणा को तोड़ देती है, जिसमें मां को हर परिस्थिति में करुणा और संरक्षण का स्वरूप माना जाता है।
घटना का क्रम जितना साधारण दिखता है, उसका परिणाम उतना ही भयावह है। एक मां, जो अपने बच्चों के साथ मायके जा रही थी,रास्ते में थका हुआ बच्चा बैठ जाता है और एक क्षणिक आवेश में वह उसे पटक देती है, पत्थर से वार करती है, और सब कुछ समाप्त हो जाता है।
क्या यह सिर्फ गुस्से का मामला है? या यह उस दबाव, थकान, मानसिक असंतुलन और सामाजिक उपेक्षा का विस्फोट है, जो लंबे समय से भीतर पल रहा था?यहीं से सवाल और गहरे होते हैं।
ग्रामीण परिवेश में रहने वाली महिलाएं अक्सर बहुआयामी दबावों से जूझती हैं, आर्थिक तंगी, पारिवारिक जिम्मेदारियां, सामाजिक अपेक्षाएं और कई बार घरेलू तनाव। इन परिस्थितियों में मानसिक स्वास्थ्य की बात लगभग न के बराबर होती है।
“सहन करना” एक संस्कार की तरह सिखा दिया जाता है, लेकिन “कहना” या “मदद मांगना” अब भी कमजोरी समझी जाती है। ऐसे में भावनाएं भीतर ही भीतर सुलगती रहती हैं, और जब वे फटती हैं, तो उसका रूप इतना भयावह हो सकता है।
इस घटना का सबसे दर्दनाक पहलू है चार साल का मासूम बच्चा। वह केवल एक गवाह नहीं है, बल्कि इस त्रासदी की जीवित पीड़ा है। उसकी स्मृतियों में यह घटना एक स्थायी छाया बनकर रहेगी। क्या हमारा समाज उसके लिए कोई सहारा बन पाएगा? या वह भी उसी चक्र का हिस्सा बन जाएगी, जहां दर्द को दबाना सिखाया जाता है?
यह घटना समाज के सामने कई कठोर प्रश्न रखती है, क्या हम अपने आसपास के लोगों के मानसिक संघर्ष को पहचान पा रहे हैं?क्या हमारे गांवों और कस्बों में ऐसी कोई व्यवस्था है, जहां कोई महिला अपने तनाव और पीड़ा को साझा कर सके?क्या प्रशासन और समाज मिलकर ऐसी संवेदनशील स्थितियों को रोकने के लिए कोई ठोस प्रयास कर रहे हैं?कानून का अपना स्थान है, अपराध हुआ है, सजा भी होगी। लेकिन क्या केवल दंड ही समाधान है? क्या यह घटना हमें यह सोचने पर मजबूर नहीं करती कि रोकथाम की दिशा में हमने क्या किया?
आज जरूरत है कि हम संवेदनशील समाज के निर्माण की दिशा में ठोस कदम उठाएं। मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता केवल शहरों तक सीमित न रहे, बल्कि गांव-गांव तक पहुंचे। आंगनबाड़ी, स्वास्थ्य कार्यकर्ता और स्थानीय प्रशासन को इस दिशा में प्रशिक्षित किया जाए कि वे ऐसे संकेतों को पहचान सकें, जहां कोई व्यक्ति मानसिक दबाव में है।
परिवारों में संवाद को प्रोत्साहित किया जाए, ताकि गुस्सा, निराशा और हताशा भीतर ही भीतर न सड़ें, बल्कि समय रहते बाहर आ सकें।मां,ममता, जो जीवन का सबसे पवित्र भाव मानी जाती है, जब क्रोध के सामने हार जाती है, तो वह केवल एक रिश्ते की नहीं, बल्कि पूरे समाज की हार होती है।
यह घटना हमें आईना दिखा रही है, एक कड़वा, असहज और दर्दनाक आईना। अब सवाल यह है कि क्या हम इस आईने में झांकने का साहस करेंगे, और उससे सीख लेकर अपने समाज को अधिक संवेदनशील, सहायक और जागरूक बनाने की दिशा में आगे बढ़ेंगे? या फिर इसे भी एक खबर मानकर भूल जाएंगे?क्योंकि अगर हम नहीं बदले, तो ऐसी घटनाएं अपवाद नहीं, बल्कि चेतावनी बनकर बार-बार सामने आती रहेंगी।













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