काफी दिनों बाद ,बस आज कलम चल गई ,,,,
दिल में इत्मीनान रख
हौसलों की उड़ान रख
जो न तपे,वो स्वर्ण क्या
तू चेहरे पे मुस्कान रख।
न जीत के हैं मायने,
न हार की यादें अमर
जो लड़ सके समय से तू
लड़ने की ऐसी शान रख
जो न तपे ,वो स्वर्ण क्या
तू चेहरे पे मुस्कान रख।।
मिली हैं मंजिले उन्हें
डटे रहे जो धार में
निखर के उभरे हैं वही,
जो खेलते मझधार में,
सुन ,तेरा भी है किनारा
पतवार अपनी तान रख,
जो न तपे वो स्वर्ण क्या?
तू चेहरे पे मुस्कान रख ।
तेरा सफर तो शेष है
अभी से क्यूं तू रुक गया
हालात पर इल्जाम मढ
समय के आगे झुक गया
उठा कदम तू हिम्मतों का,
खुदगर्ज वाली शान रख,
जो न तपे वो स्वर्ण क्या
तू चेहरे पे मुस्कान रख।।
अरे! क्यूं दुहाई मुश्किलों की,
परेशानी का विपाल क्यूं,
खुद को कोसने से क्या?
खुद के तू खिलाफ क्यूं
उठा के सर तू वार कर
जिंदादिली की शान रख
जो न तपे वो स्वर्ण क्या
तू चेहरे पे मुस्कान रख।।
दुनिया उसी की है ,जो बंदा
हालात से झुका नही
आंधी हो या मेघ गरजे
राह से हटा नही
एक सुबह भी होगी तेरी
बस देह में तू जान रख
जो न तपे वो स्वर्ण क्या
तू चेहरे पे मुस्कान रख ।।
🖊️✒️ विशाल कुजूर







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