मैं पुलिस हूँ, मुझे थकने का हक़ नहीं।”

पुलिस कभी नहीं थकती

पुलिस की वर्दी सिर्फ कपड़ों का एक टुकड़ा नहीं होती, ये उस फर्ज की निशानी होती है जिसमें थकने की इजाज़त नहीं होती। जब पूरा शहर सो रहा होता है, तब भी कहीं न कहीं कोई पुलिसकर्मी अपने घर, अपने परिवार से दूर, ड्यूटी पर तैनात होता है। न धूप की परवाह, न बारिश की परवाह, न त्योहारों की ख़ुशी, न अपनों का इंतज़ार — पुलिस का जीवन त्याग और समर्पण की जीती-जागती मिसाल है।

“पुलिस कभी नहीं थकती” — ये सिर्फ एक वाक्य नहीं, एक ऐसी हकीकत है जिसे हम अक्सर नजरअंदाज़ कर देते हैं। हमें तो बस ये दिखता है कि सड़क पर खड़ा एक कांस्टेबल ट्रैफिक संभाल रहा है, लेकिन नहीं दिखता वो पसीना जो गर्मी में उसकी पीठ तक भीग चुका है। हमें दिखती है ड्यूटी पर तैनात एक महिला पुलिस अधिकारी, लेकिन नहीं दिखती उसकी वो मासूम बेटी जो हर शाम माँ का इंतज़ार करती है और माँ, देश के लिए डटी रहती है।

थकान शरीर की नहीं, आत्मा की भी होती है। पुलिसकर्मी जब किसी मासूम की लाश देखता है, जब किसी बुज़ुर्ग की बेबसी से आँखें नम होती हैं, जब किसी गैंगवार में अपने साथी को खो देता है — तब वो भी टूटता है, लेकिन फिर भी ड्यूटी पर खड़ा रहता है। आँसू आँखों में ही रोककर, दिल के दर्द को छुपाकर वो कहता है — “मैं पुलिस हूँ, मुझे थकने का हक़ नहीं।”

समाज जब उन्हें कठोर कहता है, रिश्वतखोर कहता है, तो शायद ये भूल जाता है कि हर वर्दी के पीछे एक इंसान है, जो आपके लिए दिन-रात एक कर रहा है। जिस तरह हर परिवार में कुछ गलत लोग हो सकते हैं, वैसे ही पुलिस में भी हो सकते हैं, लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि पूरी व्यवस्था पर उंगली उठाई जाए। कोई तो है जो आपके सुकून की रातों की कीमत चुका रहा है — वो है पुलिस।

पुलिसकर्मी भी इंसान हैं। उन्हें भी दर्द होता है, उन्हें भी घर की याद आती है, उन्हें भी थकान होती है — लेकिन उन्हें ये सब महसूस करने की इजाज़त नहीं होती। क्योंकि समाज ने उन्हें एक मशीन बना दिया है — एक मशीन जो बस चले जा रही है… बिना थके, बिना रुके।

इसलिए अगली बार जब आप किसी पुलिस वाले को देखें, तो एक मुस्कान दीजिए। एक सलाम कीजिए। क्योंकि वो थका हुआ है… पर उसे थकने नहीं दिया गया।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!