तमनार में SECL की पेलमा माइंस पर घमासान क्या 1350 परिवारों की कीमत पर होगा विकास?

रायगढ़ पेलमा कोयला खदान पर घमासान, 19 मई की जनसुनवाई से पहले बढ़ा तनाव

रायगढ़, उद्योग नगरी के रूप में पहचान बना चुके जिले के तमनार क्षेत्र में एक बार फिर कोयला खदान परियोजना को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। एसईसीएल द्वारा प्रस्तावित पेलमा ओपन कास्ट कोयला खदान अब स्थानीय लोगों के लिए चिंता का बड़ा कारण बनती जा रही है। लगातार बढ़ते औद्योगिक विस्तार और पर्यावरणीय दबाव के बीच इस नई परियोजना ने विकास बनाम अस्तित्व की बहस को और तेज कर दिया है।जानकारी के अनुसार, कोल इंडिया लिमिटेड की इस प्रस्तावित खदान का संचालन एमडीओ मॉडल के तहत अडाणी ग्रुप से जुड़ी कंपनी द्वारा किया जाना है। करीब 2000 हेक्टेयर क्षेत्र में फैली इस परियोजना के तहत लगभग 361 हेक्टेयर वन भूमि के प्रभावित होने का अनुमान है। इसके अलावा 14 गांवों के लगभग 1350 परिवारों के विस्थापन और उनकी आजीविका पर गहरा असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।

जंगल उजड़ने और प्रदूषण की बढ़ती चिंता तमनार क्षेत्र पहले से ही कोयला खदानों, पावर प्लांट्स और भारी उद्योगों के कारण प्रदूषण की मार झेल रहा है। हवा, पानी और मिट्टी की गुणवत्ता लगातार गिर रही है। ऐसे में एक और बड़े पैमाने की खदान परियोजना पर्यावरणविदों और स्थानीय निवासियों के लिए गंभीर चिंता का विषय बन गई है। 362 हेक्टेयर तक जंगल उजड़ने की संभावना ने इस चिंता को और बढ़ा दिया है।

प्रभावित गांवों में असमंजस और आक्रोश परियोजना से प्रभावित होने वाले 14 गांवों के लोगों के सामने सबसे बड़ा सवाल अपने घर, जमीन और रोजगार का है। ग्रामीणों का कहना है कि पूर्व की परियोजनाओं में भी उन्हें न तो पर्याप्त मुआवजा मिला और न ही स्थायी रोजगार, शिक्षा या स्वास्थ्य सुविधाएं सुनिश्चित की गईं। उनका आरोप है कि ‘विकास’ के नाम पर उनकी जल, जंगल और जमीन छीनी जा रही है, जबकि बदले में केवल आश्वासन मिलते हैं।

19 मई की जनसुनवाई पर टिकी निगाहें इस पूरे मामले में 19 मई को पेलमा के अटल चौक में प्रस्तावित जनसुनवाई को बेहद अहम माना जा रहा है। माना जा रहा है कि इस दिन प्रशासन, कंपनी और स्थानीय ग्रामीणों के बीच आमने-सामने की स्थिति बन सकती है। हाल के महीनों में अडाणी और जिंदल समूह के खिलाफ हुए विरोध प्रदर्शनों को देखते हुए यह जनसुनवाई चुनौतीपूर्ण मानी जा रही है।

विकास बनाम अस्तित्व की लड़ाई तमनार का यह मुद्दा अब केवल एक परियोजना तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह विकास और स्थानीय अस्तित्व के बीच संतुलन की बड़ी बहस का रूप ले चुका है। विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी औद्योगिक परियोजना से पहले पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभावों का गहन मूल्यांकन, पारदर्शिता और प्रभावित लोगों के पुनर्वास की ठोस व्यवस्था सुनिश्चित करना बेहद जरूरी है।

अब सभी की निगाहें 19 मई की जनसुनवाई पर टिकी हैं, जो तय करेगी कि यह परियोजना किस दिशा में आगे बढ़ेगी।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!