“पुलिस: अप्रिय लेकिन अपरिहार्य”
समाज में पुलिस का स्थान अजीब तरह का है। एक ओर लोग उनसे दूरी बनाकर चलना चाहते हैं, दूसरी ओर संकट की घड़ी में वही सबसे पहली उम्मीद बन जाते हैं। यह विडंबना है कि जिन्हें अक्सर नापसंद किया जाता है, उन्हीं पर सबसे अधिक भरोसा किया जाता है।
पुलिसवाले भी इसी समाज का हिस्सा हैं। वे भी इंसान हैं, उनके भी सपने, दुख, और परिवार होते हैं। लेकिन ड्यूटी की वर्दी पहनते ही वे आम इंसानों से अलग समझे जाने लगते हैं — कठोर, बेरुखा, और अक्सर अन्यायपूर्ण। शायद इसलिए क्योंकि उनका काम ही ऐसा है, जहाँ उन्हें हर दिन अपराध, दर्द और धोखे से जूझना पड़ता है।
जब कोई बच्चा खो जाता है, जब कोई रात के अंधेरे में घर लौटने से डरता है, जब कोई सड़क पर लहूलुहान पड़ा होता है — तब सबसे पहले एक पुलिसवाले की आवश्यकता महसूस होती है। तब कोई उनके व्यवहार पर सवाल नहीं उठाता, तब बस उनकी मौजूदगी से ही साहस मिल जाता है।
समाज में कानून और व्यवस्था बनाए रखना एक कठिन जिम्मेदारी है। यह काम केवल डंडे या डर से नहीं चलता, इसके पीछे होती है वर्षों की ट्रेनिंग, अथक मेहनत और अक्सर अपने व्यक्तिगत सुखों की बलि।
यह सच है कि व्यवस्था में खामियां हैं, कुछ गलतियाँ भी हैं, लेकिन यह भी उतना ही बड़ा सच है कि हजारों पुलिसकर्मी हर दिन अपने जीवन को खतरे में डालकर दूसरों की सुरक्षा करते हैं।
हो सकता है पुलिस की उपस्थिति कभी-कभी डरावनी लगे, लेकिन उनकी अनुपस्थिति का डर उससे कहीं अधिक भयावह होता है।
क्योंकि अंत में —
“पुलिस किसी को पसंद नहीं, पर जरूरत सबको है।”
पुलिस: अप्रिय लेकिन अपरिहार्य













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