मनरेगा योजना में कार्य शुरू होने से पहले ही किया गया सामग्री भुगतान, उठे सवाल
ग्रामीण विकास के बड़े दावे, लेकिन भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप
जिला कोरबा के जनपद पंचायत करतला के अंतर्गत ग्राम पंचायत अमलडीहा में मनरेगा योजना के तहत “सामुदायिक नाडेप पिट” निर्माण के लिए बड़ा घोटाला सामने आया है। उपलब्ध दस्तावेज़ों के अनुसार, मस्टर रोल संख्या 6642 पर दर्ज कार्य का भुगतान 01 जून 2023 से 03 जून 2023 के बीच किया गया है। जबकि, सामग्री भुगतान इसके एक महीने पहले ही (30 अप्रैल 2023) कर दिया गया।
मुख्य तथ्य:
कार्य की जानकारी:
कार्य: सामुदायिक नाडेप पिट निर्माण
मस्टर रोल: 01-06-2023 से 03-06-2023 तक।
मस्टर रोल का भुगतान: ₹442
सामग्री भुगतान: ₹41,000
सामग्री भुगतान तिथि: 30-04-2023 (कार्य आरंभ होने से पहले)।
जिम्मेदार पदाधिकारी:
कार्यक्रम अधिकारी: संबंधित योजना की निगरानी और भुगतान की स्वीकृति।
तकनीकी सहायक: कार्य मूल्यांकन और सत्यापन के जिम्मेदार।
सरपंच और सचिव: ग्राम पंचायत स्तर पर योजना क्रियान्वयन के लिए।
रोजगार सहायक: मस्टर रोल बनाने और श्रमिकों को कार्य आवंटित करने के लिए।
सामाजिक अंकेक्षण (Social Audit):
योजना के लिए सामाजिक अंकेक्षण इकाई की निगरानी में पारदर्शिता सुनिश्चित की जाती है। बावजूद इसके, कार्य शुरू होने से पहले सामग्री का भुगतान, पारदर्शिता पर सवाल खड़े करता है।
संभावित आरोप और प्रभाव:
कार्यक्रम अधिकारी की भूमिका संदिग्ध:
सामग्री भुगतान कार्य शुरू होने से पहले कैसे और किस आधार पर स्वीकृत हुआ?
तकनीकी सहायक पर सवाल:
क्या मूल्यांकन और सत्यापन बिना स्थल निरीक्षण के किया गया?
सरपंच और सचिव की भूमिका:
स्थानीय प्रशासनिक अधिकारियों की मिलीभगत से योजना के धन का दुरुपयोग।
रोजगार सहायक की जिम्मेदारी:
श्रमिकों के नाम पर फर्जी मस्टर रोल बनाकर, वास्तविक श्रमिकों को उनका भुगतान नहीं मिला।
सामाजिक अंकेक्षण इकाई:
क्या यह इकाई केवल औपचारिकता निभाने के लिए बनाई गई है? समय रहते ऐसे मामलों को उजागर क्यों नहीं किया गया?
प्रभावित ग्रामीण और उनकी प्रतिक्रिया:
स्थानीय ग्रामीणों ने इस मामले पर नाराजगी व्यक्त की है। उनका कहना है कि मनरेगा योजना जैसी महत्वाकांक्षी योजना में इस तरह के घोटाले आम जनता के अधिकारों का हनन है। कार्य स्थल पर अभी तक कोई नाडेप पिट नहीं बना है, लेकिन भुगतान पहले ही हो गया।
पंचायत के जवाब से बचाव के प्रयास:
जब सरपंच और रोजगार सहायक से संपर्क किया गया, तो उन्होंने इस पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया। दूसरी ओर, कार्यक्रम अधिकारी ने “तकनीकी त्रुटि” का हवाला देते हुए मामले को टालने की कोशिश की।
विशेषज्ञों की राय:
एक स्थानीय आरटीआई कार्यकर्ता ने बताया कि इस प्रकार के मामलों में सीधा फंड डायवर्जन और पदाधिकारियों की मिलीभगत होती है। ऐसे मामलों की उच्च स्तरीय जांच की जानी चाहिए, ताकि दोषियों पर कार्रवाई हो।
निष्कर्ष:
मनरेगा योजना में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने की बात केवल कागजों तक सीमित दिखती है। ऐसे मामलों में दोषियों पर कार्रवाई न होने से भ्रष्टाचार और बढ़ सकता है। जिला प्रशासन और राज्य सरकार को इस मामले में सख्त कदम उठाने की आवश्यकता है।

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