मनरेगा में दोहरे वित्तीय अनियमितता का पर्दाफाश: अधिकारियों द्वारा निजी और अतिरिक्त वाहनों में व्यय का गंभीर आरोप
मरवाही छत्तीसगढ़—महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) में वित्तीय गड़बड़ी का एक और चौंकाने वाला मामला सामने आया है। जांच में पता चला है कि तत्कालीन कार्यक्रम अधिकारी पवन द्विवेदी और अन्य अधिकारियों ने अपने निजी वाहनों के साथ-साथ उन वाहनों के लिए भी खर्च दिखाया है, जिनका उनके साथ कोई सीधा संबंध नहीं है। यह मामला मनरेगा अधिनियम की स्पष्ट अनदेखी और सरकारी धन के दुरुपयोग को दर्शाता है।
स्वयं की कार होने के बावजूद दोपहिया वाहनों पर खर्च क्यों?
प्राप्त जानकारी के अनुसार:
1. CG10AW5432 (Renault Duster RXSD85PS) पवन द्विवेदी, तत्कालीन कार्यक्रम अधिकारी, जनपद पंचायत मरवाही का निजी वाहन है, जिसमें ₹88,982 का डीजल भरवाया गया।
2. इसके अलावा, अन्य वाहनों में भी पेट्रोल/डीजल का व्यय दिखाया गया है:
o CG10AJ8531 (Splendor Two Wheeler) – ₹1,032 का पेट्रोल
o CG10AR5665 (Scooty) – ₹516 का पेट्रोल
o CG10BE0355 (Scooty) – ₹3,096 का पेट्रोल
प्रश्न उठता है:
जब संबंधित अधिकारियों के पास पहले से अपनी निजी कारें उपलब्ध थीं, तो इन दोपहिया वाहनों पर खर्च क्यों दिखाया गया?
• क्या ये वाहन वास्तविक उपयोग में थे, या केवल कागजी हेरफेर के माध्यम से खर्च बढ़ाने के लिए शामिल किए गए?
• क्या इन वाहनों का उपयोग मनरेगा के कार्यों के लिए किया गया, या यह केवल व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए धन के गबन का एक तरीका था?
तत्कालीन मुख्य कार्यपालन अधिकारी का मामला
एक अन्य वाहन, MP20CJ1335 (Nexon XM1.2), तत्कालीन मुख्य कार्यपालन अधिकारी का निजी वाहन है, जिसमें ₹1,22,808 का पेट्रोल भरवाया गया।
• यह खर्च न केवल अनाधिकृत है, बल्कि यह सवाल खड़ा करता है कि सरकारी कार्यों में निजी वाहनों का उपयोग और इस पर सरकारी धन का व्यय किस अधिकार से किया गया?
मनरेगा अधिनियम के उल्लंघन
यह मामला मनरेगा अधिनियम 2005 की विभिन्न धाराओं का उल्लंघन करता है:
1. धारा 14 (वित्तीय प्रबंधन और लेखा) – इस प्रकार का खर्च योजना के तहत अनुमत नहीं है।
2. धारा 27 (भ्रष्टाचार और गबन पर दंड) – स्पष्ट रूप से निजी और गैर-आवश्यक खर्चों को योजना के धन से कवर करना अधिनियम के तहत दंडनीय है।
3. धारा 25 (पारदर्शिता और सामाजिक अंकेक्षण) – यह मामला योजना की पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
ग्रामीणों की प्रतिक्रिया और मांग
स्थानीय ग्रामीणों और समाजसेवियों ने इन गड़बड़ियों पर तीव्र नाराजगी जताई है। उन्होंने जिला प्रशासन और कलेक्टर से निम्नलिखित मांग की है:
1. स्वतंत्र जांच: इस मामले की गहन जांच के लिए एक स्वतंत्र समिति गठित की जाए।
2. दोषियों पर कार्रवाई: दोषी अधिकारियों पर मनरेगा अधिनियम और अन्य प्रासंगिक कानूनों के तहत कठोर दंडात्मक कार्रवाई की जाए।
3. गबन की वसूली: अनाधिकृत खर्च की गई पूरी राशि दोषियों से वसूल की जाए।
4. पारदर्शिता की बहाली: भविष्य में ऐसी गड़बड़ियों को रोकने के लिए सख्त प्रक्रियाओं को लागू किया जाए।
प्रशासनिक लापरवाही का प्रतीक
यह मामला सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में हो रही लापरवाही और वित्तीय गड़बड़ियों का ज्वलंत उदाहरण है। मनरेगा जैसी योजना, जो ग्रामीणों के विकास और रोजगार का माध्यम है, यदि ऐसे भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ती रही, तो इसका उद्देश्य अधूरा ही रह जाएगा।
कलेक्टर से कठोर कार्रवाई की अपील
यह अत्यावश्यक है कि जिला प्रशासन इस मामले को गंभीरता से ले और दोषी अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई सुनिश्चित करे। यह न केवल सरकारी धन की बचत करेगा, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में प्रशासनिक विश्वास भी बहाल करेगा।
प्रशांत गौतम रिपोर्ट्स

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