रायगढ़ में खुलेआम ज़हर फैलता उद्योग, खामोश प्रशासन और बीमार होती जनता
छत्तीसगढ़ का औद्योगिक हब कहलाने वाला रायगढ़ आज एक गंभीर पर्यावरणीय और जनस्वास्थ्य संकट की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है शहर और आसपास के औद्योगिक क्षेत्रों विशेषकर पतरापाली स्थित जिंदल स्टील, मां मंगला इस्पात सहित कई बड़े-छोटे उद्योगों की चिमनियों से निकलता काला, जहरीला धुआँ आम लोगों की सांसों में ज़हर घोल रहा है
स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि कई उद्योगों में प्रदूषण नियंत्रण के लिए लगाई जाने वाली ESP (Electrostatic Precipitator) मशीनें या तो बंद रहती हैं या नाम मात्र के लिए चलाई जाती हैं, जिसके कारण बिना फ़िल्टर हुआ धुआँ सीधे वातावरण में छोड़ा जा रहा है
बता दे कि कानून कहता है कि भारत में वायु (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1981 के तहत किसी भी उद्योग को यह अनिवार्य किया गया है कि वह तय मानकों से अधिक प्रदूषण न फैलाए इसके साथ ही पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 स्पष्ट रूप से कहता है कि यदि किसी उद्योग से मानव स्वास्थ्य, पर्यावरण या जैव विविधता को नुकसान पहुँचता है, तो उस पर कड़ी कार्रवाई, भारी जुर्माना और यहाँ तक कि उद्योग बंद करने का अधिकार प्रशासन के पास है
इसके बावजूद सवाल उठता है कि यदि नियम स्पष्ट हैं, यदि तकनीक उपलब्ध है, यदि प्रदूषण आंखों से दिख रहा है,तो फिर कार्रवाई क्यों नहीं?
बीमार होती जनता, बढ़ते खतरे
पतरापाली, कोतरारोड, चक्रधरनगर और आसपास के इलाकों में रहने वाले लोग बताते हैं कि बच्चों में दमा और सांस की एलर्जी बढ़ रही है बुजुर्गों को सांस लेने में तकलीफ आंखों में जलन, त्वचा रोग और लगातार खांसी आम हो गई है स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, लंबे समय तक PM2.5 और PM10 जैसे प्रदूषक कणों के संपर्क में रहने से फेफड़ों, दिल और तंत्रिका तंत्र पर गहरा असर पड़ता है प्रशासन की चुप्पी पर सवाल सबसे बड़ा सवाल जिला प्रशासन और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की भूमिका को लेकर खड़ा हो रहा है।
क्या नियमित निरीक्षण हो रहे हैं?➡️ क्या उद्योगों के उत्सर्जन डेटा की स्वतंत्र जांच हो रही है?➡️ क्या ESP मशीनों की वास्तविक स्थिति की रिपोर्ट सार्वजनिक है?यदि सब कुछ नियमों के अनुसार है, तो फिर काला धुआँ साफ दिखाई क्यों दे रहा है?और यदि नियमों का उल्लंघन हो रहा है, तो कार्रवाई किस दबाव में रुकी हुई है?
क्या बड़े उद्योगों के लिए कानून अलग है?
यह सवाल अब केवल एक शिकायत नहीं, बल्कि जनता की आवाज़ बनता जा रहा है आम नागरिक के लिए छोटे-छोटे नियमों पर तुरंत चालान, लेकिन करोड़ों का मुनाफा कमाने वाले उद्योगों पर ढील क्यों?अब बर्दाश्त नहीं जनस्वास्थ्य कोई समझौते का विषय नहीं है।
रोज़गार और विकास जरूरी हैं, लेकिन ज़हर फैलाकर नहीं यदि समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो इसका खामियाजा आने वाली पीढ़ियों को भुगतना पड़ेगा।
अब ज़रूरत है स्वतंत्र पर्यावरण ऑडिट की उद्योगों की वास्तविक रिपोर्ट सार्वजनिक करने की,नियम तोड़ने वालों पर निष्पक्ष कार्रवाई की?
क्योंकि सवाल सीधा है रायगढ़ की हवा बिकाऊ नहीं है, और लोगों की सांसें मुनाफे से सस्ती नहीं
यह रिपोर्ट स्थानीय नागरिकों की शिकायतों, दृश्य परिस्थितियों और उपलब्ध नियमों के आधार पर तैयार की गई है। संबंधित पक्षों का पक्ष आने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।



Post By Deepak Sharma ✍️✍️✍️







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