अडानी को सौंपा गया पुरुंगा कोयला खदान — आदिवासियों की ज़मीन पर बीजेपी सरकार का बुलडोज़र


अडानी को सौंपा गया पुरुंगा कोयला खदान — आदिवासियों की ज़मीन पर बीजेपी सरकार का बुलडोज़र

✍️ रिपोर्ट : पूजा जायसवाल, NKB National News

रायगढ़
धरमजयगढ़ क्षेत्र के पुरुंगा गांव में एक बार फिर आदिवासियों की ज़मीन और जंगल पर संकट मंडरा रहा है। रायगढ़ जिले की कीमती संपदा को अडानी समूह को सौंपने का सिलसिला जारी है। राज्य की भाजपा सरकार ने स्थानीय लोगों के तीखे विरोध के बावजूद पुरुंगा कोयला खदान को अडानी समूह के स्वामित्व वाली अंबुजा सीमेंट कंपनी को आवंटित कर दिया है।

लगभग 2150 एकड़ में फैला यह खदान क्षेत्र पेसा कानून के तहत संरक्षित इलाका है, जहां के आदिवासी और ग्रामीण दशकों से जंगल, जल और जमीन पर निर्भर हैं। बावजूद इसके, सरकार ने कॉरपोरेट हितों को प्राथमिकता देते हुए स्थानीय लोगों की आवाज़ को दरकिनार कर दिया है।

गौरतलब है कि पुरुंगा क्षेत्र की तीन ग्राम पंचायतों ने आगामी 11 नवम्बर को प्रस्तावित जनसुनवाई के खिलाफ सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किया है। ग्रामीणों ने प्रशासन को साफ कहा है कि वे अपनी ज़मीन किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ेंगे। लेकिन, सरकार जनभावनाओं की अनदेखी करते हुए जनसुनवाई कराने पर अड़ी हुई है।

ग्रामीणों का आरोप है कि यह जनसुनवाई केवल दिखावे के लिए है। असल फैसला पहले ही अडानी समूह के पक्ष में लिया जा चुका है। स्थानीयों का कहना है कि यह परियोजना उनके जंगल, जलस्रोत, खेती और जीवनशैली पर सीधा असर डालेगी। क्षेत्र के वन क्षेत्रों में हाथियों का आवास भी है, जिससे वन्यजीवों पर भी खतरा बढ़ेगा।

कांग्रेस विधायक उमेश पटेल ने कहा कि —

“बीजेपी सरकार लगातार छत्तीसगढ़ की संपदा को अडानी बेचने का काम कर रही है। रायगढ़ जिले में क्षेत्रवासियों के भयंकर विरोध के बावजूद भाजपा सरकार ने धरमजयगढ़ की पुरंगा कोयला खदान अडानी समूह की कंपनी अंबुजा सीमेंट को सौंप दी है। यह प्रदेश की जनता के साथ विश्वासघात है।”

उन्होंने यह भी कहा कि भाजपा सरकार पेसा कानून को ठेंगा दिखाते हुए आदिवासी क्षेत्रों में कंपनियों के हित साधने का काम कर रही है।
उन्होंने स्पष्ट कहा — “यह लड़ाई रायगढ़ से नहीं, पुरुंगा की धरती से लड़ी जाएगी। हम ग्रामीणों की मांगों का पूरा समर्थन करते हैं। लड़ाई जारी रहेगी — अडानी भगाओ, छत्तीसगढ़ बचाओ।”

ग्रामीण संगठनों ने भी सरकार को चेताया है कि यदि 11 नवम्बर की जनसुनवाई रद्द नहीं की गई, तो हजारों की संख्या में लोग सड़कों पर उतरेंगे।


निष्कर्ष:

पुरुंगा की लड़ाई केवल एक खदान की नहीं — यह छत्तीसगढ़ के जंगलों, आदिवासियों के अधिकारों और पेसा कानून की मर्यादा की लड़ाई है। सवाल यह है कि क्या सरकार संविधान की भावना के साथ खड़ी होगी, या कॉरपोरेट के हित में जनता की आवाज़ को फिर कुचल देगी?


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