मुखौटे

मुखौटे

मुखौटे पर मुखौटा लगाए फिरते हैं,
चेहरे पर चेहरा सजाए फिरते हैं।
हर बात में झूठ की चादर ओढ़े,
सच की तो जैसे कब्र खोदे फिरते हैं।

मतलब आने पर शहद से भी मीठे,
और ना हो जरूरत, तो ज़हर से भी तीखे।
हाथ मिलाते हैं मुस्कुराकर,
पीठ पीछे खंजर चलाते हैं छिपाकर।

ये इंसान हैं मेरे दोस्त,
गिरगिट से भी ज़्यादा रंग बदलते हैं।
हर रिश्ते में सौदेबाज़ी,
हर वादे में सिर्फ साजिश पलते हैं।

कभी दोस्ती, कभी प्रेम का नाम लेकर,
लालच और स्वार्थ की जाल बिछाते हैं।
भावनाओं को खिलौना समझकर,
कभी खेलते, कभी तोड़ जाते हैं।

संस्कारों की बातें करते हैं जब मंचों पर,
और पीछे वही संस्कृति को बेच आते हैं।
नैतिकता के नाम पर भाषण देते हैं,
पर खुद की आत्मा से नज़रें चुराते हैं।

ऐसे ज़माने में कैसे यकीन करें?
किस चेहरे पर विश्वास करें, किसको परखें?
अब तो सच भी झूठ जैसा लगता है,
क्योंकि सच बोलने वाला ही सबसे अलग लगता है।

पंडित कान्हा शास्त्री

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