जब कोई माँ अपने बच्चे के लिए अकेले जीवन का बोझ उठाती है, तो वह सिर्फ एक माँ नहीं रहती — वह एक योद्धा बन जाती है। लेकिन अफ़सोस, हमारे समाज की सोच अब भी उस स्तर तक नहीं पहुँच पाई जहाँ इस संघर्ष को इज़्ज़त की नज़र से देखा जाए।
एकल माँ का जीवन दोहरी ज़िम्मेदारियों से भरा होता है — एक पिता की कमी को भी पूरा करना और एक माँ की ममता को भी बनाए रखना। लेकिन समाज… वह सवाल करता है, ताने मारता है, चरित्र पर उंगली उठाता है।
“क्या गलती की थी इसने?”
“क्यों अकेली रह गई?”
“क्या यह अपने बच्चे को सही परवरिश दे पाएगी?”
कोई यह नहीं पूछता कि वह कितनी रातें जागकर अपने बच्चे की तबीयत संभालती है, कितनी बार अपने आंसुओं को पीकर मुस्कान ओढ़ लेती है ताकि बच्चा कभी दुख न समझे।
यह विडंबना है कि एकल पिता को ‘बहादुर’ कहा जाता है और एकल माँ को ‘शक के घेरे’ में डाला जाता है। यह समाज भूल जाता है कि उस औरत ने अपने आत्म-सम्मान की खातिर अकेले चलने का फ़ैसला लिया — वो भी तब जब दुनिया उसे गिराने के लिए तैयार खड़ी थी।
क्या इतनी बड़ी सज़ा सिर्फ इसलिए कि वो अकेली है?
समाज को अब अपनी सोच बदलनी होगी। एकल माँ को इज़्ज़त दीजिए, सहारा नहीं तो कम से कम तिरस्कार भी मत दीजिए। उसके लिए समाज एक जंग का मैदान है, और वह हर दिन अपने आत्मबल से उस मैदान में टिके रहने की कोशिश कर रही है।
उसके संघर्ष को नज़रंदाज़ मत कीजिए — वह सिर्फ माँ नहीं, एक पूरी दुनिया है।












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