आज पत्रकारिता की आड़ में जो हो रहा है, वो अभिव्यक्ति की आज़ादी नहीं बल्कि सिस्टम का दुरुपयोग है।
खुद को पत्रकार बताकर कुछ लोग अपराध करते हैं, वसूली करते हैं, धमकाते हैं और फिर “मीडिया” का डर दिखाकर बच निकलते हैं।
पुलिस और प्रशासन भी कई बार इसलिए चुप रहता है क्योंकि निगेटिव खबरों का डर होता है, जबकि सच्चाई यह है कि कई जगह वही लोग खुद भी उजागर होने से डरते हैं।
सवाल यह है कि कब तक फर्जी पत्रकारिता का बोलबाला रहेगा?
कब तक कोई भी व्यक्ति अधिकारी के साथ फोटो खिंचवाकर, DP लगाकर खुद को “किंग” समझता रहेगा?
अब वक्त आ गया है कि
🔹 पत्रकारिता के लिए स्पष्ट नियम बनें
🔹 केवल मान्यता प्राप्त संस्थानों, अच्छे बैकग्राउंड और अनुभव वाले पत्रकारों को ही आधिकारिक पहचान मिले
🔹 जो जनहित में लिखते हैं, सवाल पूछते हैं—उन्हें संरक्षण मिले
🔹 और जो पार्टी प्रचार, क्राइम, वसूली या धमकी के लिए पत्रकारिता का सहारा ले रहे हैं उन पर कठोर कार्रवाई हो
पत्रकारिता सेवा है, हथियार नहीं
अगर अभी नियम नहीं बने, तो कल सच बोलने वाले दबेंगे और नकली चेहरे सत्ता बनकर घूमते रहेंगे।अब सिर्फ बहस नहीं, ठोस कार्रवाई चाहिए।















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