आरक्षक पर, जो खाकी की असली रीढ़ है, पर अक्सर नजरों से ओझल रहता है:

आरक्षक पर, जो खाकी की असली रीढ़ है, पर अक्सर नजरों से ओझल रहता है:


आरक्षक – खामोश कंधों पर टिकी है कानून की नींव”

जब भी कोई बड़ा अधिकारी आता है, कैमरे उसकी तरफ घूम जाते हैं। बाइट उसी की चलती है, सम्मान उसी के हिस्से आता है। लेकिन क्या किसी ने कभी पीछे खड़े उस आरक्षक को देखा है? उस सिपाही को, जो चुपचाप खड़ा रहता है – कड़ी धूप हो या मूसलधार बारिश, ड्यूटी उसकी पहली और आखिरी पूजा बन जाती है।

आरक्षक – पुलिस महकमे का पहला और सबसे मजबूत आधार। वही सबसे पहले घटनास्थल पर पहुँचता है, वही सबसे आखिरी तक डटा रहता है। सर्च ऑपरेशन हो, वीआईपी ड्यूटी, या रात की गश्त – सबसे पहले नाम उसी का होता है। पर जब बात आती है पहचान की, तो वो सिर्फ ‘सिपाही’ बनकर रह जाता है – जैसे उसकी मेहनत, उसकी जान की कीमत, सिर्फ एक नामपट्टी जितनी हो।

उसका दिन सूरज से पहले शुरू होता है और रात, अक्सर ड्यूटी की गाड़ी में ही ढल जाती है। लेकिन न थकान जताने का हक, न शिकायत करने की आज़ादी। हवलदार से लेकर एसपी तक, सबकी हिदायतें उसी तक आती हैं – पर उसका दर्द, उसकी बातें कभी चैनलों की हेडलाइन नहीं बनतीं।

हर दिन वो वर्दी पहनता है, पर बहुत कम दिन उसे सम्मान मिलता है। वो हर त्योहार पर ड्यूटी करता है, ताकि लोग बेफिक्र रहकर त्योहार मना सकें। लेकिन उसके अपने घर में वो त्योहार कब मनाया गया – ये पूछने वाला कोई नहीं होता।

आरक्षक बोलता नहीं, बस करता है।
शोर नहीं करता, पर सबसे पहले हर संकट में उतरता है।
उसकी जान भी उतनी ही कीमती है, जितनी किसी अधिकारी की, पर जब कोई शहीद होता है – तब भी सुर्खियाँ अक्सर उसकी वर्दी की रैंक से तय होती हैं।

काश… कोई समझे कि थाना चलाने वाला सिर्फ अधिकारी नहीं होता। अगर ‘कंधा’ आरक्षक का न हो, तो ‘कमांड’ किसी काम की नहीं।
अगर वो गश्त न करे, तो ऑफिस की मीटिंग्स बेमानी हो जाएँ।
अगर वो रातभर जागे नहीं, तो सुबह चैन की नींद किसी को नसीब न हो।


आरक्षक कोई आम आदमी नहीं – वो वो है, जिसके दम पर पुलिस का ‘सम्मान’ और ‘सिस्टम’ दोनों टिके हैं।


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