सोना-चाँदी के मुकुट और खाली स्कूल — आखिर भगवान कहाँ बसते हैं?

सोना-चाँदी के मुकुट और खाली स्कूल — आखिर भगवान कहाँ बसते हैं?

✍️ पूजा जायसवाल

भारत को “आस्था का देश” कहा जाता है। गाँव-गाँव, शहर-शहर में मंदिरों की घंटियाँ गूँजती हैं। भक्त अपने भगवान को खुश करने के लिए सोने-चाँदी के मुकुट, दरवाज़े और गहनों से मंदिरों को सजा देते हैं। करोड़ों रुपये की भव्यता में आस्था की चमक तो दिखती है, लेकिन विडंबना यह है कि उन्हीं गाँवों में बच्चों के पास न ठीक से पढ़ने के लिए स्कूल है, न बैठने को कुर्सी, न पढ़ाने को शिक्षक।

क्या भगवान को सचमुच इन महंगे मुकुटों और दरवाज़ों की ज़रूरत है?

अगर वे वास्तव में सर्वशक्तिमान हैं, तो उन्हें न सोना चाहिए, न चाँदी, न आलीशान मंदिर। उन्हें चाहिए सिर्फ़ भक्ति, एक सच्चा दिल, और मानवीय सेवा।हमारे समाज में आस्था की दिशा कहीं न कहीं भटक गई है। जो दान सोने-चाँदी पर खर्च होता है, अगर वही दान किसी गाँव की पाठशाला, किसी अनाथालय या किसी मज़दूर के बच्चे की पढ़ाई में लगाया जाए तो न सिर्फ़ समाज रोशन होगा, बल्कि भगवान भी मुस्कुराएँगे। महान संत कबीर ने कहा था—”माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रौंदे मोहे,एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूंगी तोहे।”आज के दौर में यह पंक्ति हमें यही याद दिलाती है कि दिखावे की भक्ति भगवान तक नहीं पहुँचती। असली भक्ति है सेवा, शिक्षा और इंसानियत।समाज को सोचना होगा कि भगवान कहाँ बसते हैं — सोने-चाँदी के मुकुटों में, या मासूम बच्चों की मुस्कान और उनकी पढ़ाई मे।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!